Sunday, June 20, 2010

भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था एवं पंचायते

हरियाणा आर्थिक एवं राजनैतिक तौर पर भारत का एक समृद्ध प्रदेश है। इन दिनोँ यहाँ पंचायत के चुनाव चल रहे है। पंचायते भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि सबसे छोटी एवं महत्वपूर्ण इकाई है। पंचायते ग्रामीण भारत मे लोकतन्त्र का प्रतिनिधित्व करती है। कुछ वर्षो पूर्व पंचायत के चुनावो मे ना तो इतनी हिंसा थी, ना ही इतनी फिजुलखर्ची। आज लोग उधार पैसा लेकर भी लाखो खर्च करते। आज जितना उन्माद पंचायत के चुनाव मेँ है उसने गाँव के सम्पूर्ण सोह्दर्य एवं भाईचारे का खात्मा कर दिया है। आज बरसोँ पुरानी मित्रता एव खून के रिस्ते इक पल मेँ एक वोट कि खातिर दुश्मनी मे बदल जाते है।आज मेरी समझ मे एक बात नही की ये राजनीति है क्या, ये समाज सेवा है या नौकरी। यदि समाज सेवा है तो भारत का सौभाग्य या पता नही र्दुभाग्य है कि लगभग हर भारतीय आज राजनैतज्ञ है। आज सभी लोग मन्त्री व प्रधानमन्त्री बनना चाहते है। क्योकि ऐसा होने के लिए कुछ भी नही चाहिए छोङकर धन एवं बाहुबल को।यदि राजनीति नौकरी है तो इसकी कोई निर्धारित योग्यता नही है। कोई भी जो अपराधी है या अपराध से पीङित है, अनपढ़ है या पढ़ालिखा, भ्रष्टाचारी है या बलात्कारी सभी इस नौकरी के लिए आवेदन कर सकते है। दोनो ही तरह की राजनीति हानिकारक एव दुःखदायी है।

Saturday, September 12, 2009

पहला सफल प्रयोग

आज मैँ रसायन शास्त्र (Chemistry)  का अध्यापक हुँ एव मुझे अध्यापन मेँ आठ वर्ष का अनुभव है । मै अपनेँ विद्यार्थीयो को प्रयोगशाला (Laboratory) मेँ प्रयोग ( Experiment )  करवाता हुँ एव खुद भी अपना शोध कार्य ( research Work ) बहुलक विज्ञान( Polymer Science)  मेँ पुरा कर रहा हुँ । लेकिन मेरा पहला शोध मैने उस समय किया था , जब मैँ माध्यमिक कक्षा ( Middle Class ) मेँ पढ़ता था । सरकारी विद्यालयोँ मे ना तो उस समय ना ही आज सही तरीके सेँ विज्ञान की पढ़ाई होती है । प्रयोगिक विज्ञान ( Experimental Science ) के मामले मे तो हरियाणा के सरकारी एवँ निजी दोनो की हालात एक जैसी है । उन परिस्थितियोँ मेँ घर पर देशी प्रयोग ही मन की जिज्ञासा ( curiosity )  को शान्त करते थे। मेरा पहला प्रयोग भी मन की जिज्ञासा को शान्त करने के लिए ही था। उस समय मैँ आठवीँ क्क्षा का विद्यार्थी रहा हुँगा। उस दिन आसमान मेँ बादल छाए हुए थे एवं कुछ -कुछ बूंदाबांदी हो रही थी। मैँ अपने पैतृक कुए पर स्नान के लिए गया था। वहाँ रखे विस्फोटक रसायनिक मिश्रण (Explosive Chemical Mixture) ( जिसका प्रयोग नीलगायो को डरा कर भगाने के लिए होता था ) एवं गंधक के अम्ल( Sulphuric Acid ) ( मेरे चाचा जी बैटरी के लिए लाए थे ) को देखकर उनकी रसायनिक अभिक्रिया ( Chemical Reaction) एवं उससे होने वाले सम्भावित विस्फोट को देखने कि जिज्ञासा हुई । मैने अम्ल की बोतल रसायनिक मिश्रण मे उडेल दी (रसायनिक मिश्रण काँच कि बोतल मेँ था ।) बोतल का मुहँ अच्छी तरह बन्द करकेँ उसेँ एक चारपाई के पिछे रख दिया । थोडी देर प्रतिक्षा करने पर जब विस्फोट नही हुआ तो मैने ढक्कन को सख्ती से बन्द करने के उद्देश्य से बोतल को छुआ तो अचानक विस्फोट हो गया । मेरे शरीर के कई हिस्सोँ मेँ काँच चुभ गए थे। मैने वो काँच निकाले घाव धोए एव स्नान करके घर आ गया । उस समय परिवार जनोँ के डर से मैने ना तो उस घटना का जिक्र किया ना ही उन्हेँ घाव का पता चलनेँ दिया । लेकिन आज जब उस घटना के बारे मे सोचता हु तो बडा अजीब सा लगता है। डर भी लगता है कि कही कुछ हो जाता तो, खुशी भी होती है कि पहला ही प्रयोग एक सफल प्रयोग था ।

Thursday, September 10, 2009

उपनिषद मन्त्र

1 नित्योऽनित्यानां चेतनोऽचेतनाम् , एको बहूनां यो

विदधाति कामान् ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः

                        शाश्वती नेतरेषाम् ।।        ----  कठोपनिषद

जो अनित्य पदार्थो मेँ नित्य है, अचेतन जग की एकमात्र चेतना है  जो सभी कार्यो मे समान रुप से विद्यमान है। उस ईश्वर को जो अपने मे देखता है उसी को शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, दुसरो को नही

2     स धाता स विधर्ता स वायुर्नम उच्छितम् ।

         सोऽर्यमा स वरुणः स रुद्रः स महादेवः।

         सो अग्निः स उ सूर्यः एव महायमः ।

वह (ईश्वर) धाता है, वह विधाता है,

वही वायु , वही आकाश मेँ उठा मेघ है ।

वही अर्यमा वही वरुण , रूद्र और महादेव है।

वही अग्नि , सूर्य और महायम है ।

3        स वरुणः सायमग्निर्भवति स मित्रो भवति प्रातरुद्यन् ।

           स सविता भूत्वान्तरिक्षण याति स इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम् ॥

वह सांयकाल अग्नि और वरुण होता है

और प्रातःकाल उदय होता हुआ मित्र होता है।

वह सविता होकर अन्तरिक्ष से चलता है ,

वह इन्द्र होकर मध्य से द्युलोक को तपाता है ।

Ganesh vandana


प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिध्दये ॥1॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्त द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिग्ङाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकं ॥2॥
लम्भोदरं पञ्चम च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तम विघ्नराजं च धूम्रवर्णँ तथाष्टमम् ॥3॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपति द्वादशं तु गजाननम्॥4॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥5॥
विद्धार्थी लभते विद्धां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥6॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्रभिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥7॥
अष्टभ्यो ब्राह्माणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेतः ।
तस्य विद्धा भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥8॥

Saturday, August 15, 2009

Mother India

जिस देश मेँ जन्म लिया और जिसका अन्न खाया, उसके ऋण से मुक्त हुए बिना अपने लिए स्वर्ग के द्वार कदापि नही खुल सकते। -

                                                          विनायक दामोदर सावरकर

Monday, July 20, 2009

वेद उपनिषद्

अभयं मित्रादभयमत्राद् , अभयं ज्ञातादभयं पुरो यः। अभयं नक्तमभयं दिवा नः , सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु ।

                                अथर्ववेद

नित्योऽनित्यानां चेतनोऽचेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान्। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शास्वती नेतरेषाम्॥

~ कठोपनिषद्

यो देवौ अग्नौ यो अप्सु यो विश्वभूवनमाविवेश। यो औषधीषु यो वनस्पतीषु तस्मै देवाय नमो नमः॥ ~ श्वेताश्वतर उपनिषद्

Saturday, July 18, 2009

Indian national symbols

Indian National Bird – Peacock     ( P. cristatus )

Indian national fruit – Mango  ( Mangifera indica )

Indian national flower – Lotus ( Nymphaea )

Indian national animal – Tiger ( Panthera tigris )

Indian national tree – Banyan ( Ficus bengalensis )

National song – VandeMatram – Bankimchandra Chatrgi

Ist sang in1896

National Antham—Jan Gan Man  -- Ravindera nath tagore

Ist sang in 27 December 1911 in Kolcutta

Indian national calender Saka Sanwt

Wednesday, July 15, 2009

सङ्क्टनाशनगणेशस्त्रोम्

 

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।

भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिध्दये ॥1॥

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्त द्वितीयकम् ।

तृतीयं कृष्णपिग्ङाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकं ॥2॥

लम्भोदरं पञ्चम च षष्ठं विकटमेव च।

सप्तम विघ्नराजं च धूम्रवर्णँ तथाष्टमम् ॥3॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।

एकादशं गणपति द्वादशं तु गजाननम् ॥4॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥5॥

विद्धार्थी लभते विद्धां धनार्थी लभते धनम् ।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥6॥

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्रभिर्मासैः फलं लभेत् ।

संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥7॥

अष्टभ्यो ब्राह्माणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेतः ।

तस्य विद्धा भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥8॥